Wednesday, 5 June 2019

मित्रता_विज्ञान


एक समय की बात है 
है हाल ही की यह कहानी , 
ना पंचतत्र की न जातक  की
न है बहुत पुरानी |

हकीकत है कोई झूट नहीं
न काल्पनिक इसमें  किरदार  कोई, 
दो आम  मनुष्य  पर निर्भर  है
न जादू  है न चमत्कार  कोई |

है प्रयागराज  में घटी  यह
कोई दुर्घटना  नहीं एक घटना  है, 
न डरना  तुम  बस पढ़ते  जाओ 
न रुकना  है न भटकना  है |

जीवन  में आगे  बढ़  पाया
जब साथ छोड़ा बुराई का, 
विज्ञान में रूचि आयी  ऐसी 
कि रस्ता दिखा अच्छाई￰ का |

विज्ञान की ऊँगली  पकड़कर 
जीवन के पथ  पर चल पड़ा , 
विज्ञान के सहारे  आज वह 
अपने पैरो  पर हुआ खड़ा |

पता तो उसका  पता नहीं है
पर नाम है राजनराज , 
बीते कल में क्या था वो
और क्या बन गया  है आज |

सोचा न था मैंने भी कभी
वह बन पायेगा  इस काबिल, 
जो घर तपस्या  की उसने 
अब  हुई सफलता   हासिल |

पहले तो वह मूर्ख था
अब है मुझसे  ज्ञानी , 
उसके इस बदलाव  से
आज सबको है हैरानी |

अकेले वह असमर्थ  था
बनने को इतना ज्ञानी, 
चर्चा उसकी होने लगी￰
जब मित्र बना एक विज्ञानी |

प्रियांश नामक  उस  वैज्ञानिक ने 
जब हाथ  बढ़ाया  मित्रता  का, 
तब राजन ने छोड़े  बुरे  कर्म 
और जाना अर्थ  पवित्रता का |

जब मिले  दो विज्ञानी 
तभी से बदला  राजनराज, 
इनकी  बढ़ती  मित्रता से
क्यों होगा  मुझको  ऐतराज |

साथ दिया  प्रियांश ने जब
सब  करने  करने लगे  उसका सम्मान , 
जो मूर्ख कभी कहलाता  था
अब कहलाता है वह महान |

हर वस्तु का विज्ञान पढ़ा 
पर पढ़ा न कभी मित्रता का विज्ञान, 
प्रियांश के बिन वह कुछ न था
उसी से बनी राजन  की पहचान |

शुरू हुआ मित्रता का सफर 
पर तय  न की मंज़िल, 
दो कदम  ज्यों क्या बढ़े
कि प्रकट  हुयी मुश्किल |

हर मोड़  पर नया  पड़ाव 
मित्र बनते गए  राजनराज के, 
ज़माना भी अब बदल गया
और दिन  भी बदल गए आज के |

आरम्भ से लेकर अंत  तक
यह अलग कभी न होएंगे , 
साथ बैठ यह हस्ते  है तो
साथ बैठ ही रोयेंगे |

सुधरेगा कभी न राजनराज
पर बुद्धिमान अब लगता है, 
पहले मूर्ख वह थोड़ा  था
अब बेवकूफ कब  लगता है |

इसे विज्ञान कहुँ या मित्रता
यह कवि भी समझ न पाया, 
भगवन की भी अलग है लीला
कही धूप है तो कही छाया |


                    - यश कुमार

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