एक समय की बात है
है हाल ही की यह कहानी ,
ना पंचतत्र की न जातक की
न है बहुत पुरानी |
ना पंचतत्र की न जातक की
न है बहुत पुरानी |
हकीकत है कोई झूट नहीं
न काल्पनिक इसमें किरदार कोई,
दो आम मनुष्य पर निर्भर है
न जादू है न चमत्कार कोई |
न काल्पनिक इसमें किरदार कोई,
दो आम मनुष्य पर निर्भर है
न जादू है न चमत्कार कोई |
है प्रयागराज में घटी यह
कोई दुर्घटना नहीं एक घटना है,
न डरना तुम बस पढ़ते जाओ
न रुकना है न भटकना है |
कोई दुर्घटना नहीं एक घटना है,
न डरना तुम बस पढ़ते जाओ
न रुकना है न भटकना है |
जीवन में आगे बढ़ पाया
जब साथ छोड़ा बुराई का,
विज्ञान में रूचि आयी ऐसी
कि रस्ता दिखा अच्छाई का |
जब साथ छोड़ा बुराई का,
विज्ञान में रूचि आयी ऐसी
कि रस्ता दिखा अच्छाई का |
विज्ञान की ऊँगली पकड़कर
जीवन के पथ पर चल पड़ा ,
विज्ञान के सहारे आज वह
अपने पैरो पर हुआ खड़ा |
जीवन के पथ पर चल पड़ा ,
विज्ञान के सहारे आज वह
अपने पैरो पर हुआ खड़ा |
पता तो उसका पता नहीं है
पर नाम है राजनराज ,
बीते कल में क्या था वो
और क्या बन गया है आज |
पर नाम है राजनराज ,
बीते कल में क्या था वो
और क्या बन गया है आज |
सोचा न था मैंने भी कभी
वह बन पायेगा इस काबिल,
जो घर तपस्या की उसने
अब हुई सफलता हासिल |
वह बन पायेगा इस काबिल,
जो घर तपस्या की उसने
अब हुई सफलता हासिल |
पहले तो वह मूर्ख था
अब है मुझसे ज्ञानी ,
उसके इस बदलाव से
आज सबको है हैरानी |
अब है मुझसे ज्ञानी ,
उसके इस बदलाव से
आज सबको है हैरानी |
अकेले वह असमर्थ था
बनने को इतना ज्ञानी,
चर्चा उसकी होने लगी
जब मित्र बना एक विज्ञानी |
बनने को इतना ज्ञानी,
चर्चा उसकी होने लगी
जब मित्र बना एक विज्ञानी |
प्रियांश नामक उस वैज्ञानिक ने
जब हाथ बढ़ाया मित्रता का,
तब राजन ने छोड़े बुरे कर्म
और जाना अर्थ पवित्रता का |
जब हाथ बढ़ाया मित्रता का,
तब राजन ने छोड़े बुरे कर्म
और जाना अर्थ पवित्रता का |
जब मिले दो विज्ञानी
तभी से बदला राजनराज,
इनकी बढ़ती मित्रता से
क्यों होगा मुझको ऐतराज |
तभी से बदला राजनराज,
इनकी बढ़ती मित्रता से
क्यों होगा मुझको ऐतराज |
साथ दिया प्रियांश ने जब
सब करने करने लगे उसका सम्मान ,
जो मूर्ख कभी कहलाता था
अब कहलाता है वह महान |
सब करने करने लगे उसका सम्मान ,
जो मूर्ख कभी कहलाता था
अब कहलाता है वह महान |
हर वस्तु का विज्ञान पढ़ा
पर पढ़ा न कभी मित्रता का विज्ञान,
प्रियांश के बिन वह कुछ न था
उसी से बनी राजन की पहचान |
पर पढ़ा न कभी मित्रता का विज्ञान,
प्रियांश के बिन वह कुछ न था
उसी से बनी राजन की पहचान |
शुरू हुआ मित्रता का सफर
पर तय न की मंज़िल,
दो कदम ज्यों क्या बढ़े
कि प्रकट हुयी मुश्किल |
पर तय न की मंज़िल,
दो कदम ज्यों क्या बढ़े
कि प्रकट हुयी मुश्किल |
हर मोड़ पर नया पड़ाव
मित्र बनते गए राजनराज के,
ज़माना भी अब बदल गया
और दिन भी बदल गए आज के |
मित्र बनते गए राजनराज के,
ज़माना भी अब बदल गया
और दिन भी बदल गए आज के |
आरम्भ से लेकर अंत तक
यह अलग कभी न होएंगे ,
साथ बैठ यह हस्ते है तो
साथ बैठ ही रोयेंगे |
यह अलग कभी न होएंगे ,
साथ बैठ यह हस्ते है तो
साथ बैठ ही रोयेंगे |
सुधरेगा कभी न राजनराज
पर बुद्धिमान अब लगता है,
पहले मूर्ख वह थोड़ा था
अब बेवकूफ कब लगता है |
पर बुद्धिमान अब लगता है,
पहले मूर्ख वह थोड़ा था
अब बेवकूफ कब लगता है |
इसे विज्ञान कहुँ या मित्रता
यह कवि भी समझ न पाया,
भगवन की भी अलग है लीला
कही धूप है तो कही छाया |
यह कवि भी समझ न पाया,
भगवन की भी अलग है लीला
कही धूप है तो कही छाया |
- यश कुमार

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