Wednesday, 5 June 2019

एक रात



एक अँधेरी रात में
अकेला ही मैं
न किसी के साथ में
मैं निकल आया घर से बाहर 
दिल में था थोड़ा डर
अकेले खड़ा था मैं तन्हाई के संग 
अकेले इतनी रात को
बहुत डर रहा था मैं
देख देखकर अंधेरे के रंग
पता नही क्या सूझी मुझको
कि चल पड़ा चौराहे तक
मैं थोड़ा टहलने के लिए
सुनसान सड़क पे अकेले मुझे
घूर रही थी बन्द दुकाने 
जैसे अचानक झपटने के लिए
दूर दूर तक अंधियारे में
बस था सन्नाटा छाया हुआ
दफन हो जैसे उन गलियो में
कोई राज़ छुपाया हुआ
डर डर के मैं आगे बड़ा
फिर महसूस किया कि
कोई तो और है यहाँ मेरे सिवा
कदम रुक से गए है
वही चौराहे पर आकर और
थम सी गई है वह सरसराती हवा
किसके पीछे छुप जाऊ
बस हूँ अकेला मैं यहाँ खड़ा
डर से काँप रहा था मैं
और मेरे पैर गए लड़खड़ा
अँधेरा तो था ही डरावना पर
अँधेरे में भौकते हुए कुत्ते 
मुझे और डरा रहे थे 
पर मेरा दिल बहलाने को
बन्द दुकानों के वे शटर
मुझे अपने किस्से सुना रहे थे
फिर नज़र पड़ी उस चाँद पर
जो मुझे डरता हुआ देखकर 
मुझे चिढ़ाने के लिए
थोड़ा डराने के लिए
उल्टे सीधे मुह बना रहा था
और कहा उसने कि डर रहा हूँ
किसलिए मैं आखिर
वोह उड़ते काले बादल 
और सरारती हुई हवा 
तो मुझे ऐसे ही डरा रहे थे
सब के साथ वे शरारत करते है
सबकी तरह ही वे
मेरा भी मज़ाक बना रहे थे
उसने कहा मुझसे कि 
वो तो सारी रात जागता है
शरारती हवाओं और बदलो को
वह उन्हें अक्सर डाँटता है 
क्योंकि वोह निडर है 
उसे किसी से डर नही
सुनसान सड़को का 
वो सन्नाटा अंधेरे के संग
हँसती हँसाती हुई
उन चाँद सितारों के रंग
बस......
यही पर आवाज़ आई 
उठो ...सुबह हो गई 
और कितना सोओगे 
सपना यही पर टूट गया
चाँद का साथ टूट गया
वह तो एक सपना था पर
आते है सपने ऐसे कभी कभी
पर खयाल आया की सूर्य
तो जाग रहा होगा अभी
फिर मैं बाहर की दौड़ा
तेज़ी से ......
कोशिश की सूर्य की नज़रो से 
नज़रे मिलाने की पर 
वोह बहुत चमकीला था
और मुझसे रूठ गया था बेवजह
जो मुझसे बात ही नही करता था
उससे अच्छा तो काल रात वाला चाँद था
जो मुझसे कितना प्यार करता था ।


                             - यश कुमार

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