Wednesday, 5 June 2019

चित्रकारी प्रतियोगिता

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ये उस वक़्त की बात है जब मै सातवीं मे पढता था और गलत सलत अंग्रेजी मे कविताये लिख ही  लेता था  पर इतनी भी अच्छी नहीं | उस समय तक आते आते मैंने चित्रकारी छोड़ दी थी क्यूंकि मुझे उन चीज़ो मे अब मन नहीं लगता था और मैंने कविताये लिखना शुरू कर दिया था जो मेरे लिए एक बहुत ही अच्छी चीज साबित हुई |
पर ये बात सिर्फ मुझे और मेरे प्रियमित्र अच्युत को पता थी| मेरे  दोस्त ही नहीं बल्कि मेरे माता-पिता भी इस बात से अपरिचित थे | अच्युत ने मेरी बहुत सहायता की और मुझे मेरे लक्ष्य की राह दिखाई | वह एक संस्कारी और समझदार लड़का था |पढ़ाई और चित्रकारी मे उसका कोई भी मुकाबला नहीं कर सकता था | उसके बदौलत ही आज मे इतने बड़े मुकाम पर पंहुचा हूँ कि यह कहानी लिख पाया हूँ|
  उससे पहले तो मै एक सीधा साधा भोला भाला डरपोक सा एक मामूली बच्चा था | पंद्रह अगस्त का  दिन था | हमारी कॉलोनी मे हर साल इस दिन एक प्रतियोगिता आयोजित की जाती थी  | मुझे खेल कूद मे इतनी रुचि नहीं थी लेकिन यहाँ एक चित्रकला प्रत्योगिता भी रखी जाती थी और शायद आज के दिन भी यह प्रतियोगिता होगी बस यही सोचकर ही तो मैं आज यहाँ आया था |

हमेशा की तरह आज भी हमारे कॉलोनी के बड़े से मैदान मे यह प्रतियोगिता रखी गई | पूरे मैदान मे बच्चे ही बच्चे  थे क्यूंकि यह प्रतियोगिता ख़ास बच्चों के  लिए आयोजित की जाती थी | आज के दिन,  कॉलोनी मे  रहने वाले मेरे जितने भी दोस्त यार थे सब एक जगह इकठ्ठा हुए थे, एक बड़े से मैदान मे |

सब के चेहरे पर उत्सुकता छाई हुई थी लेकिन मेरा मन इस बात को लेकर विचलित था कि क्या आज यहाँ चित्रकला प्रतियोगिता होगी और क्या मुझे उसमे भाग लेना चाहिए |  अगर मेरा मज़ाक़ बन गया तो क्या होगा | लेकिन दो साल पहले मैं इसी प्रतियोगिता  मे प्रथम आया था बस इसी बात ने मेरा हौसला बढ़ाया और और मैंने उस प्रतियोगिता मे भाग लेने कि ठान ली |
मेरे दोस्त यार और मेरा  छोटा भाई लक्ष्य  भी मुझसे बार बार कहता रहा कि अगर मैंने हिस्सा लिया तो  मैं ज़रूर जीत जाऊंगा पर मेरा मन नहीं मान रहा था | प्रतियोगिता शुरू हुई लेकिन पहले बच्चो की दौड़ होनी थी | मेरा भाई लक्ष्य ने अपने दोस्त चंदू के साथ तीन टंगड़ी वाले दौड़ मे दौड़ने का फैसला किया लेकिन वे प्रथम तो नहीं आये पर उन्हें मज़ा बहुत आया होगा |
मेरे दोस्त आशु ने मेरे समक्ष यह प्रस्ताव रखा कि मै भी उसके साथ तीन टंगड़ी वाली दौड़ मे दौड़ू लेकिन मैंने उसे मना कर दिया क्यूंकि  मुझे खेल कूद इतना पसंद नहीं था और आशु  किसी और के साथ दौड़ा| पर मेरा मन तो बस इस बात कर लगा हुआ था कि वोह चित्रकला वाली प्रतियोगिता होगी या नहीं | वैसे बच्चों कि दौड़ देखकर मज़ा आ रहा था |
तीन टंगड़ी वाली दौड़ मे अगर कुछ  बच्चे वही गिर जाये तो देखने वालो का अच्छा खासा मुफ्त मे मनोरंजन हो जाता था  | और उसके बाद हुई जलेबी दौड़ | कुछ लोग तो इसमें जीतने के लिए नहीं, बल्कि जलेबी खाने के लिए भाग लेते थे |हँसते हँसते पता ही नहीं चला कब  बच्चों कि दौड़ खत्म हो गई | आखिर फिर वो घड़ी आ गई जिसका मुझे वर्षो से इंतज़ार था | चित्रकारी प्रतियोगिता शुरू होने को थी |
मैंने देखा कि वहां कुछ बड़े लोग थे जो उन बच्चों को एक कतार मे खड़ा कर रहे थे जो चित्रकारी प्रतियोगिता मे भाग लेना चाह रहे थे | मेरा मन तो बिलकुल नहीं था लेकिन मेरा भाई और मेरे दोस्त मुझे ज़बरदस्ती मुझसे कह रहे थे कि मै जाऊ और उसमे हिस्सा लूँ क्यूंकि उन्हें मुझपर भरोसा था | मैं ज़रूर जीतूँगा ऐसा उनका कहना था पर मै चित्रकारी पहले ही छोड़ चुका था |
फिर भी अपने दोस्तों के दबाव मे आकर मै आगे बड़ा और जाके उस लाइन मे खड़ा हो गया | वहां सिर्फ मै था और मेरे सामने चार बच्चे और थे जो उस प्रतियोगिता मे हिस्सा लेना चाह रहे थे | मेरा  एक दोस्त था सत्यम | वह उन चार बच्चों मे से एक था | प्रतियोगिता शुरू होने ही वाली थी लेकिन मै हमेशा कि तरह आज भी घर से पेंसिल और रंग लाना भूल गया था |
तभी सत्यम ने मुझे बताया कि वह भी पेंसिल और रंग अपने घर पर भूल गया है | वह अपने घर जा रहा था तो उसने मुझे भी अपने साथ आने को कहा और वह मुझे अपने साथ अपनी साइकिल पे बैठाकर ले गया | मेरा घर तीसरी मंज़िल पर था | सीडी से ऊपर चढ़ के जाना फिर नीचे आना  मेरे लिए बहुत संघर्ष वाला काम था | लौटते वक़्त मुझे वहां तक दौड़कर जाना पड़ा |

  हाँफते हुआ थका हारा मै वहां पंहुचा तो देखा कि सत्यम और उन बच्चों  ने चित्र बनाना शुरू भी कर दिया है | मैं दौड़कर उनके पास गया और उनके साथ बैठकर मै भी शुरू हो गया | एक तो मै पहले से इतना थक गया था ऊपर से अब उस सफ़ेद से पन्ने पर मै क्या बनाऊ मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था | तभी एक आदमी से मैंने पुछा "अंकल, हमें बनाना क्या है | " उन्होंने कहा कि हमें स्वतंत्रता दिवस से समबन्धित कुछ बनाना है |"
 
मुझे ऐसा लग रहा थी कि वह सफ़ेद पन्ना जिसपर मुझे चित्र बनाना था,  वह मुझे घूर रहा हो और मन ही मन मुझे चुनौती दे रहा हो कि मैं उसके ऊपर कुछ बनाकर दिखाऊ | थोड़ी देर तक सोच विचार करने के बाद  मुझे एक उपाए आया | मैंने मन ही मन सोचा कि क्यों ना मै वह चीज बनाऊ जो मैंने पिछली बार इस प्रतियोगिता मे,  इसी जगह बैठकर बनाई थी और मैं प्रथम आया था |

फिर मानो मुझमे जोश आ गया हो,  मैंने अपनी पेंसिल उठाई और लगा बनाने एक मोर | मोर का चित्र बनाते वक़्त मेरा ध्यान सिर्फ उस पन्ने पर था | मेरे दोस्त यार और बाकि बच्चे बार बार आकर हमें देख रहे थे | मुझे देख कर मेरे दोस्त यार कह रहे थे कि ' यह मै क्या बना रहा हूँ,' इससे तो मै पक्का हार जाऊंगा | मैंने उनकी बातो पर बिलकुल  ध्यान नहीं दिया |

एक नीला प्यारा सा मोर बनाया जो अपने पर फैलाये हुआ था और वही खाली जगह पर सुन्दर शब्दो मे लिख दिया     ' नीलकंठ ' | कैसे भी करके आखिर मैंने अपना चित्र खत्म किया | एक अंकल आये और एक तरफ से सबका पन्ना जमा किया | फिर मै अपने  दोस्त यार के बीच मे गया | वे सब खड़े होकर हसीं मज़ाक करने मे  व्यस्त थे | फिर मुझे देखके वे मुझसे  कह रहे थे कि ' मैं ज़रूर जीतूंगा | '
कुछ तो कई बार मेरे पास आकर मुझसे कह रहे थे कि वे देखकर आए है कि मेरी चित्रकारी के लिए मुझे प्रथम घोषित कर दिया गया है लेकिन मुझे उनकी बातो पर बिलकुल यकीन नहीं हो रहा था | इस बात को लेकर मै बिलकुल बैचैन था | देखते ही देखते वो घड़ी आ गई जब इस प्रतियोगिता का परिणाम घोषित किया जा रहा था |
सारे बच्चे बिलकुल उत्सुक थे | पहले, दौड़ मे जीतने वाले बच्चों के नाम लिए गए | जिस बच्चे का भी नाम लिया जाता, वह आगे जाता  और अपना इनाम लेकर वापस अपने स्थान पर आ जाता | फिर बारी आई चित्रकारी प्रतोयोगिता मे भाग लेने वाले बच्चों का नाम बोले जाने की | उस प्रतियोगिता मे सत्यम प्रथम आया | मुझे इस बात से दुख नहीं हुआ |
  फिर उसके बाद किसी और बच्चे का नाम लिया गया | मुझे इस बात का भी दुख नहीं था कि मै दुसरे स्थान पर भी नहीं आया लेकिन उसके बाद मेरा नाम बोला गया | मैं तो हैरान था कि मै तीसरा आया हूँ | लेकिन यह मेरी ग़लतफहमी थी| मै आगे बढ़कर अपना  इनाम लेने गया तो उन्होंने मेरे हाथ मे एक नटराज की पेंसिल और एक तीन रूपए वाला रबड़ पकड़ा दिया |
 
ऐसा ही उन्होंने बाकि उन बच्चों के साथ किया जो इस प्रतियोगिता जीते नहीं, पर हिस्सा लिए | मै शर्म से लाल लाल हो गया | मै यह सब देख कर बिलकुल दंग रह गया | फिर मै वापस लौटा जहाँ मेरे दोस्त यार खड़े थे | मेरे हाथ मे पेंसिल रबड़ देखकर मेरे दोस्त मुझपर बहुत हँसे और वे सब ऐसा महसूस कर रहे थे कि मेरी वजह से उन सब की बहुत ज्यादा ही बेज़्ज़ती हो गई हो |

उस वक़्त उनके मुँह से कुछ ऐसे शब्द निकले  " क्या यश ! हमने तुम पर इतना भरोसा किया, तुमने ने तो  हमारी इज़्ज़त मिट्टी मे मिला दी | मैंने कहा था ना तुमसे, वह मोर बना  देने से तुम नहीं जीत पाओगे | "उनके मुख से कड़वे शब्दो का निकलना  तब बंद  हुआ जब हर साल की तरह कुछ अंकल हाथ मे टॉफियों की थैली लिए बच्चों की ओर आये और उन्हें टॉफिया बाटने लगे | सारे बच्चे उनकी ओर झपट पड़े सिर्फ एक टॉफी पाने के  लिए |

अपने  दिल के दर्द को छुपाने के लिए मैंने भी ऐसा दिखाया कि मुझे उस छोटी सी प्रतियोगिता मे हारने से कोई फर्क नहीं पड़ता और मै भी फिर से अपने दोस्तों के साथ शामिल हो गया | घर लौटते वक़्त भी वे ताने दे रहे थे लेकिन मैंने अपने आप को सँभालते हुए उनके तानो के विष के प्याले को हँसते हुए पी लिया |
लेकिन आज भी मुझे जब वह बात याद आती है तो मै अपने आप को बहुत  शर्मिंदा महसूस करता हूँ | मैं भले ही वहां हार गया था लेकिन मेरे प्रियमित्र अच्युत ने कहा था मुझसे कि"मै जिस चीज के लिए बना हूँ मुझे उस चीज पर ही पर ध्यान देना चाहिए | लोग तो कहेँगे ही क्यूंकि लोगो का तो काम है कहना |" मैं उड़ते हुए एक ही बार गिरा हूँ क्यूंकि मै गलत दिशा मे उड़ रहा था इसका मतलब यह तो नहीं होगा कि मै उड़ना छोड़ दूँ |
सच्ची घटना पर आधारित
लेखक यश कुमार
10/05/2019

एक रात



एक अँधेरी रात में
अकेला ही मैं
न किसी के साथ में
मैं निकल आया घर से बाहर 
दिल में था थोड़ा डर
अकेले खड़ा था मैं तन्हाई के संग 
अकेले इतनी रात को
बहुत डर रहा था मैं
देख देखकर अंधेरे के रंग
पता नही क्या सूझी मुझको
कि चल पड़ा चौराहे तक
मैं थोड़ा टहलने के लिए
सुनसान सड़क पे अकेले मुझे
घूर रही थी बन्द दुकाने 
जैसे अचानक झपटने के लिए
दूर दूर तक अंधियारे में
बस था सन्नाटा छाया हुआ
दफन हो जैसे उन गलियो में
कोई राज़ छुपाया हुआ
डर डर के मैं आगे बड़ा
फिर महसूस किया कि
कोई तो और है यहाँ मेरे सिवा
कदम रुक से गए है
वही चौराहे पर आकर और
थम सी गई है वह सरसराती हवा
किसके पीछे छुप जाऊ
बस हूँ अकेला मैं यहाँ खड़ा
डर से काँप रहा था मैं
और मेरे पैर गए लड़खड़ा
अँधेरा तो था ही डरावना पर
अँधेरे में भौकते हुए कुत्ते 
मुझे और डरा रहे थे 
पर मेरा दिल बहलाने को
बन्द दुकानों के वे शटर
मुझे अपने किस्से सुना रहे थे
फिर नज़र पड़ी उस चाँद पर
जो मुझे डरता हुआ देखकर 
मुझे चिढ़ाने के लिए
थोड़ा डराने के लिए
उल्टे सीधे मुह बना रहा था
और कहा उसने कि डर रहा हूँ
किसलिए मैं आखिर
वोह उड़ते काले बादल 
और सरारती हुई हवा 
तो मुझे ऐसे ही डरा रहे थे
सब के साथ वे शरारत करते है
सबकी तरह ही वे
मेरा भी मज़ाक बना रहे थे
उसने कहा मुझसे कि 
वो तो सारी रात जागता है
शरारती हवाओं और बदलो को
वह उन्हें अक्सर डाँटता है 
क्योंकि वोह निडर है 
उसे किसी से डर नही
सुनसान सड़को का 
वो सन्नाटा अंधेरे के संग
हँसती हँसाती हुई
उन चाँद सितारों के रंग
बस......
यही पर आवाज़ आई 
उठो ...सुबह हो गई 
और कितना सोओगे 
सपना यही पर टूट गया
चाँद का साथ टूट गया
वह तो एक सपना था पर
आते है सपने ऐसे कभी कभी
पर खयाल आया की सूर्य
तो जाग रहा होगा अभी
फिर मैं बाहर की दौड़ा
तेज़ी से ......
कोशिश की सूर्य की नज़रो से 
नज़रे मिलाने की पर 
वोह बहुत चमकीला था
और मुझसे रूठ गया था बेवजह
जो मुझसे बात ही नही करता था
उससे अच्छा तो काल रात वाला चाँद था
जो मुझसे कितना प्यार करता था ।


                             - यश कुमार

माँ


हाँ ! तू ही तो वह चित्रकार है
मै तेरा रचा कोई मोहक चित्र हूँ माँ |
सब कहते मुझे एक साधारण बच्चा
बस तेरी ही नज़रो मे मै विचित्र हूँ माँ |

अँधेरे से डरकर तेरे पीछे छुपना
मै भूल गया हूँ अब वैसा करना,
क्यूंकि मै अब बढ़ा हो गया हूँ माँ |
मेरा भविष्य है तुझे ही रचना 
सिखलाया था तुम्ही ने मुझको चलना,
पर अब अपने पैरो पर खड़ा गया हूँ माँ |

क्यों रोती थी तू मुझे रोता देखकर
तुझे रोता देख तो मै नाटक समझता था |
क्यों करता तुझसे इतनी सख़्ती से बात मै
दूसरों को उदास देख तो मै तुरंत पिघलता था |

मुझे माफ़ कर देना माँ
जो याद ना था मुझे कि,
मातृदिवस आज ही मनाया जाता है |
साल मे एक दिन के लिए
सिर्फ माँ को ही सबसे अनमोल मानकर,
सारी दुनिया को भुलाया जाता है |

सब अपनी माँ पे आज
प्यार लुटाये जा रहे है,
बेटे खुद अपने हाथो से
अपनी माँ को खाना खिला रहे है |

तेरा मै लाडला तो नहीं हूँ
पर हूँ तो मै तेरी ही संतान माँ,
अपने हाथो से  खिलाया नहीं
मैंने तुझे कभी पकवान माँ |

क्या जलन होती है तुझको
दूसरी माँओ की संतान को देखकर,
सिखला दे मुझे भी कैसे हँस पाती है तू
माँ मेरे लिए  तू इतने कष्ट झेलकर |

माँ की एहमियत को समझ ना पाया मै
उलझा रहा दुनिया की झूठी बातो मे,
डर लगता था तो तेरे आँचल मे छुपकर
चैन से सो जाता था मै अँधेरी रातो मे |

अब तो बढ़ा हो गया हूँ ना मै
दोस्तों के संग ही  घूमता रहता हूँ,
कभी रोता था तुझसे दूर होने पर
अब पैसे ही हर जगह ढूंढ़ता रहता हूँ |

तू खड़ी होकर घर की चौखट पर
जमकर वही करती थी इंतजार मेरे आने का,
जिस दिन मै एक निवाला भी ना खाता था
तू भूल जाती थी अपना वक़्त भी खाने का |

क्यों इतनी फ़िक्र करती है तू मेरी
मैंने दिया ही क्या है तुझे माँ,
सारा जीवन अपना व्यर्थ कर दिया
सिर्फ मेरी खुशी के लिए क्यों तूने माँ |

मै सर्वश्रेष्ठ ज्ञानी इतना पढ़ा-लिखा
माँ को बस एक आम नारी समझता था |
क्या मै एक अकेला हूँ दुनिया मे जो
धन पाकर माँ- बाप को अपने से दूर करता था |

ना कोई गुरु ना कोई गोबिंद
माँ से महान है कोई नहीं जग मे,
माँओ से तो यह दुनिया है
सारी दुनिया रंगी हुई है माँ के ही रंग मे |

                                      - यश कुमार

बेटी



है वर्षो से लोगो का कहना
पड़ेगा आधी जिंदगी ढोना ,
क्यों चाहे हम बेटी को
बेटी तो एक बोझ है ना।

बेटी को बस जल्द से जल्द
विवाह कर के विदा है करना ,
बेटा हैं जीवन का सहारा
बेटी को बस बोझ समझना।

क्यों पाले एक बेटी को
जो पूजे हमे ईश्वर समान ,
कर बेटे पर इतना भरोसा
गलती करता हर इनसान ।

बेटा है तो खुशिया है
बेटी है तो बस है रोना ,
क्यों चाहे हम बेटी को
बेटी तो एक बोझ है ना ।

बेटी है तो है गरीबी
पर बेटा तो कमाएगा ,
करेगा सेवा खूब हमारी
खुशिया घर में लाएगा ।

दहेज देंगे कहा से  जब
हम होंगे इतने गरीब ,
जब बेटी होगी घर में तब
दुख मुश्किलें होंगी करीब ।

जब घर में होगी बेटी तो
पड़ेगा सुख के साधन खोना ,
क्यों चाहे हम बेटी को
बेटी तो एक बोझ है ना ।

दहेज कहा से देंगे हम
जब होगा बेटी का विवाह ,
कौन चुनेगा आखिर
काटों से भरा हुआ राह ।

बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ
बस नाम का है यह अभियान ,
लड़ना होगा खुद हमें
बचाने को बेटियों का सममान ।

क्या बेटी है सिर्फ पत्थर
और बेटा है महँगा सोना ,
क्यों चाहे हम बेटी को
बेटी तो एक बोझ है ना ।

कर नही रहा मैं बेटों का अपमान
क्योंकि मैं भी तो एक बेटा हूँ ,
पर बचाना है बेटियों का जीवन
बस इसीलिए शब्दो को ऐसे समेटा हूँ ।

मैं बेटो को बुरा नही कहता
पर होते है बहुत से बेटे ऐसे ,
जिसने पाला-पोसा उसी को
काट लेते है आस्तीन के साँप के जैसे ।

पहलो अपने दिल में तुम भी
बेटी के प्यार का गहना ,
क्यों चाहे हम बेटी को
बेटी तो एक बोझ है ना ।

                        - यश कुमार


हे प्रियमित्र



सोचा न था कि नए-नए आते ही तुम मेरे इतने अच्छे दोस्त बन जाओगे l
पता न था कि कुछ ही दिनों में तुम इतने छा जाओगे l

पूरे स्कूल के वक़्त तुम हमेशा मेरे साथ रहते   थे l
भले ही मॉनिटर बन गए थे पर मुझे कभी भी कुछ नही कहते थे l

जल्दी ही तुम सभी के आंखों का तारा बन गए l
जिन्होंने ने भी तुम्हारा तमाशा बनाया वे खुद सबके नज़रो में तमाशा बन गए l

लंच के समय हमेशा हम साथ मे खाना खाते   थे l
चलती हुई कक्षा में भी तुम मुझको बहुत सताते थे l

हमारे घर एक दूसरे से मीलो दूर थे |
यही तो वजह थी जो हम मजबूर थे l

काश हम एक दूसरे के पड़ोसी होते l
खुशहाली का जीवन होता और हमारी दोस्ती में कोई दरार नही होती l
मेरी और तुम्हारी दोस्ती के बीच मे कोई दीवार नही होती l

जब भी तुम नही आते थे तो पूरा दिन मेरा स्कूल में बेकार 
जाता था l
जब पूछता था तुमसे वजह मैं तो एक नया बहाना सुनने में आता था l

अक्सर छुट्टी के समय मुझे तुम्हारे कहने पर और देर तक रुकना पड़ता था l
तुम्हारी छोटी छोटी शरारतों से हमारा दोस्ताना और बढ़ता था l

तुम्हारे बिना लंच करने में तो टिफ़िन खोलने का मन ही नही करता था l
तुम्हारे बिना खाना खाने में तो स्वादिष्ट पकवान भी कड़वे करेले सा लगता था l

कोई विश्वशनीय न था बस तुम्हारा ही साथ था |
मेरी कामयाबी के पीछे तुम्हारा बहुत बड़ा हाथ था |

मैं कवि था और तुम चित्रकार थे |
छोटी सी उम्र से ही हम बडे कलाकार थे |

तुम्हारे कारनामो का सच में कोई जवाब नही था |
तुम्हारी अच्छाइयों का वाकई कोई हिसाब नही था |

मेरी पहली बेकार सी कविता पर भी तुमने उसे गज़ब बताकर मेरा हौसला बढ़ाया था |
तुम्ही में मुझको कवि बनाकर मेरे अंदर के भय के दिए को बुझाया था |

मेरी कविताओ को दुनिया के प्रकाश में तुम्ही  ने लाया था |
कविता भले ही मैंने लिखी थी पर मेरी कला को तुम्ही ने जगाया था |

दुनिया में तुम सा कोई है ही नही तुम्हारा नाम ही नही तुम खुद भी अनूठे थे |
मेरी पहली कविता गज़ब की थी बस तुम इसी बात के झूठे थे |
तुम्हारे उस झूठ से ही तो में आज इस क़ाबिल हूँ जो, यह कविता रच पाया हूँ ,
बस तुम्हारा ही तो साथ था जो मैं उन सब से आगे बढ़ पाया हूँ |
                               - यश कुमार

मैं_एक_कवि


बर्फ का छोटा  टुकड़ा हूँ मैं
आज छोड़ हिमालय पिघला  हूँ,
मन में थोड़े सपने लेकर
कवि बनने निकला हूँ  |

भटक रहा हूँ इधर उधर 
आखिर यह रस्ता कहाँ को  जाता  है,
कहीं पढ़ न  जाये  घर  को लौटना 
यही सोचकर  दिल  घबराता  है |

बर्फ टुकड़ा बन  पिघला था                                             नदी से  जा  मिला  सागर में,
चाँद बनकर मैं चमकूंगा 
कभी आसमान  की चादर  में |

मैं एक टूटते तारे -सा आज                                         ब्रह्माण्ड  से फिसला  हूँ,
दिलमें थोड़ी  ले  उम्मीदे 
मैं कवि बनने निकला हूँ |

अहंकार को फेक  दूर  कही
मैं  मानव बनना  सीख  रहा हूँ,
गुमसुम बैठा हूँ एक किनारे 
पर  मन ही  मन मैं चीख  रहा हूँ |

इस युद्ध में लड़ने  आया  हूँ
तो विजय होकर  ही जाऊँगा ,
हार मिली  तो कर  स्वीकार  मैं
फिर से वापस  लौट   के  आऊँगा  |

अभी तो मैंने शुरुआत  की है
उन कवियों  से मैं पिछला हूँ,
मनमें थोड़ी यादें  लेकर
मैं कवि बनने निकला हूँ |

हारा नहीं हूँ अभी मैं
ना घर जाने  की देरी  है,
मनमें कल्पना  भरी पढ़ी है
मस्तिष्क में कविता  ठहरी  है |

मैं दूसरो से क्या  बात करू 
मैं खुद में खोया  रहता हूँ ,
इस दिल को मैं कर अनदेखा
दुनिया के ताने  सेहता हूँ |

बनके मुसाफिर भटक रहा हूँ
घरकी चौखट  से फिसला हूँ,
दिल में प्यारे ख्वाब सजा कर
मैं कवि बनने निकला हूँ |

भावनाओ से भरा  हुआ  हैं
मेरे मन का कोना  कोना,
लोगो को क्या फर्क पड़ेगा 
इस दुनिया में मेरा  होना  |

मैं बैठ अकेले एक कोने में￰
कोई  गीत  पुराना गाऊँगा,
तन-मन मेरा नाच  उठेगा 
जब में कवि बन जाऊँगा |

अकेलेपन से घिरा  हुआ हूँ
मैं बिन फूलो  का गमला  हूँ,
इन हाथो को कुछ काम  सिखाने 
मैं कवि बनने निकला हूँ |

                                        - यश कुमार

मित्रता_विज्ञान


एक समय की बात है 
है हाल ही की यह कहानी , 
ना पंचतत्र की न जातक  की
न है बहुत पुरानी |

हकीकत है कोई झूट नहीं
न काल्पनिक इसमें  किरदार  कोई, 
दो आम  मनुष्य  पर निर्भर  है
न जादू  है न चमत्कार  कोई |

है प्रयागराज  में घटी  यह
कोई दुर्घटना  नहीं एक घटना  है, 
न डरना  तुम  बस पढ़ते  जाओ 
न रुकना  है न भटकना  है |

जीवन  में आगे  बढ़  पाया
जब साथ छोड़ा बुराई का, 
विज्ञान में रूचि आयी  ऐसी 
कि रस्ता दिखा अच्छाई￰ का |

विज्ञान की ऊँगली  पकड़कर 
जीवन के पथ  पर चल पड़ा , 
विज्ञान के सहारे  आज वह 
अपने पैरो  पर हुआ खड़ा |

पता तो उसका  पता नहीं है
पर नाम है राजनराज , 
बीते कल में क्या था वो
और क्या बन गया  है आज |

सोचा न था मैंने भी कभी
वह बन पायेगा  इस काबिल, 
जो घर तपस्या  की उसने 
अब  हुई सफलता   हासिल |

पहले तो वह मूर्ख था
अब है मुझसे  ज्ञानी , 
उसके इस बदलाव  से
आज सबको है हैरानी |

अकेले वह असमर्थ  था
बनने को इतना ज्ञानी, 
चर्चा उसकी होने लगी￰
जब मित्र बना एक विज्ञानी |

प्रियांश नामक  उस  वैज्ञानिक ने 
जब हाथ  बढ़ाया  मित्रता  का, 
तब राजन ने छोड़े  बुरे  कर्म 
और जाना अर्थ  पवित्रता का |

जब मिले  दो विज्ञानी 
तभी से बदला  राजनराज, 
इनकी  बढ़ती  मित्रता से
क्यों होगा  मुझको  ऐतराज |

साथ दिया  प्रियांश ने जब
सब  करने  करने लगे  उसका सम्मान , 
जो मूर्ख कभी कहलाता  था
अब कहलाता है वह महान |

हर वस्तु का विज्ञान पढ़ा 
पर पढ़ा न कभी मित्रता का विज्ञान, 
प्रियांश के बिन वह कुछ न था
उसी से बनी राजन  की पहचान |

शुरू हुआ मित्रता का सफर 
पर तय  न की मंज़िल, 
दो कदम  ज्यों क्या बढ़े
कि प्रकट  हुयी मुश्किल |

हर मोड़  पर नया  पड़ाव 
मित्र बनते गए  राजनराज के, 
ज़माना भी अब बदल गया
और दिन  भी बदल गए आज के |

आरम्भ से लेकर अंत  तक
यह अलग कभी न होएंगे , 
साथ बैठ यह हस्ते  है तो
साथ बैठ ही रोयेंगे |

सुधरेगा कभी न राजनराज
पर बुद्धिमान अब लगता है, 
पहले मूर्ख वह थोड़ा  था
अब बेवकूफ कब  लगता है |

इसे विज्ञान कहुँ या मित्रता
यह कवि भी समझ न पाया, 
भगवन की भी अलग है लीला
कही धूप है तो कही छाया |


                    - यश कुमार

Being Alone

Baddest thing is being alone
Saddest thing is being alone ,
When nobody is with you
Maddest thing is being alone .

Sitting alone in a corner side
Leaved the smiling now I cried ,
Having fun at school or park
Without your friends you can't spark .

No needs of any friends or foes
I am the one who plays with toys ,
I am the craziest person in the world
I am the one who can't enjoy .

For whom could I cry
On whom could I laugh ,
If I am similar to a half of an apple
So where's my another half .

Baddest thing is being alone
Saddest thing is being alone ,
When nobody is with you
Maddest thing is being alone .


                              - Yash Kumar

Peace

NO NOISE NO DISTURBANCE
THERE LIVES ONLY PEACE ,
NOBODY WANTS TO PLAY WITH ME 
NOBODY WANTS ME TO TEASE .

THAT'S SIMILAR TO THE HELL
I DIDN'T WANT THAT LIFE, 
NO FRIENDS,  NO BUDDIES 
I AM SURFING ON A KNIFE. 

A BEAUTIFUL WHITE DOVE 
CAN CREATE THE PEACE EVERYWHERE ,
WITH WHOM I CAN BORROW? 
WITH WHOM I CAN SHARE  ?

IT IS WORSE LIVING THAT LIFE 
WHERE NOBODY TALKS WITH ME, 
THERE'S ME AND NOBODY ELSE 
IT'S SO SILENT AS THE SEA. 

I WISH TO HAVE A FRIEND
I WANT SOMEBODY TO PLAY WITH, 
I DIDN'T AGREE WITH THAT 
I ACCEPT IT ONLY AS A MYTH. 


                                    - Yash Kumar

मैं_एक_कवि

बर्फ का छोटा  टुकड़ा हूँ मैं आज छोड़ हिमालय पिघला  हूँ, मन में थोड़े सपने लेकर कवि बनने निकला हूँ  | भटक रहा हूँ इधर उधर  आखिर ...