बर्फ का छोटा टुकड़ा हूँ मैं
आज छोड़ हिमालय पिघला हूँ,
मन में थोड़े सपने लेकर
कवि बनने निकला हूँ |
आज छोड़ हिमालय पिघला हूँ,
मन में थोड़े सपने लेकर
कवि बनने निकला हूँ |
भटक रहा हूँ इधर उधर
आखिर यह रस्ता कहाँ को जाता है,
कहीं पढ़ न जाये घर को लौटना
यही सोचकर दिल घबराता है |
आखिर यह रस्ता कहाँ को जाता है,
कहीं पढ़ न जाये घर को लौटना
यही सोचकर दिल घबराता है |
बर्फ टुकड़ा बन पिघला था नदी से जा मिला सागर में,
चाँद बनकर मैं चमकूंगा
कभी आसमान की चादर में |
चाँद बनकर मैं चमकूंगा
कभी आसमान की चादर में |
मैं एक टूटते तारे -सा आज ब्रह्माण्ड से फिसला हूँ,
दिलमें थोड़ी ले उम्मीदे
मैं कवि बनने निकला हूँ |
दिलमें थोड़ी ले उम्मीदे
मैं कवि बनने निकला हूँ |
अहंकार को फेक दूर कही
मैं मानव बनना सीख रहा हूँ,
गुमसुम बैठा हूँ एक किनारे
पर मन ही मन मैं चीख रहा हूँ |
मैं मानव बनना सीख रहा हूँ,
गुमसुम बैठा हूँ एक किनारे
पर मन ही मन मैं चीख रहा हूँ |
इस युद्ध में लड़ने आया हूँ
तो विजय होकर ही जाऊँगा ,
हार मिली तो कर स्वीकार मैं
फिर से वापस लौट के आऊँगा |
तो विजय होकर ही जाऊँगा ,
हार मिली तो कर स्वीकार मैं
फिर से वापस लौट के आऊँगा |
अभी तो मैंने शुरुआत की है
उन कवियों से मैं पिछला हूँ,
मनमें थोड़ी यादें लेकर
मैं कवि बनने निकला हूँ |
उन कवियों से मैं पिछला हूँ,
मनमें थोड़ी यादें लेकर
मैं कवि बनने निकला हूँ |
हारा नहीं हूँ अभी मैं
ना घर जाने की देरी है,
मनमें कल्पना भरी पढ़ी है
मस्तिष्क में कविता ठहरी है |
ना घर जाने की देरी है,
मनमें कल्पना भरी पढ़ी है
मस्तिष्क में कविता ठहरी है |
मैं दूसरो से क्या बात करू
मैं खुद में खोया रहता हूँ ,
इस दिल को मैं कर अनदेखा
दुनिया के ताने सेहता हूँ |
मैं खुद में खोया रहता हूँ ,
इस दिल को मैं कर अनदेखा
दुनिया के ताने सेहता हूँ |
बनके मुसाफिर भटक रहा हूँ
घरकी चौखट से फिसला हूँ,
दिल में प्यारे ख्वाब सजा कर
मैं कवि बनने निकला हूँ |
घरकी चौखट से फिसला हूँ,
दिल में प्यारे ख्वाब सजा कर
मैं कवि बनने निकला हूँ |
भावनाओ से भरा हुआ हैं
मेरे मन का कोना कोना,
लोगो को क्या फर्क पड़ेगा
इस दुनिया में मेरा होना |
मेरे मन का कोना कोना,
लोगो को क्या फर्क पड़ेगा
इस दुनिया में मेरा होना |
मैं बैठ अकेले एक कोने में
कोई गीत पुराना गाऊँगा,
तन-मन मेरा नाच उठेगा
जब में कवि बन जाऊँगा |
कोई गीत पुराना गाऊँगा,
तन-मन मेरा नाच उठेगा
जब में कवि बन जाऊँगा |
अकेलेपन से घिरा हुआ हूँ
मैं बिन फूलो का गमला हूँ,
इन हाथो को कुछ काम सिखाने
मैं कवि बनने निकला हूँ |
मैं बिन फूलो का गमला हूँ,
इन हाथो को कुछ काम सिखाने
मैं कवि बनने निकला हूँ |
- यश कुमार

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