Wednesday, 5 June 2019

मैं_एक_कवि


बर्फ का छोटा  टुकड़ा हूँ मैं
आज छोड़ हिमालय पिघला  हूँ,
मन में थोड़े सपने लेकर
कवि बनने निकला हूँ  |

भटक रहा हूँ इधर उधर 
आखिर यह रस्ता कहाँ को  जाता  है,
कहीं पढ़ न  जाये  घर  को लौटना 
यही सोचकर  दिल  घबराता  है |

बर्फ टुकड़ा बन  पिघला था                                             नदी से  जा  मिला  सागर में,
चाँद बनकर मैं चमकूंगा 
कभी आसमान  की चादर  में |

मैं एक टूटते तारे -सा आज                                         ब्रह्माण्ड  से फिसला  हूँ,
दिलमें थोड़ी  ले  उम्मीदे 
मैं कवि बनने निकला हूँ |

अहंकार को फेक  दूर  कही
मैं  मानव बनना  सीख  रहा हूँ,
गुमसुम बैठा हूँ एक किनारे 
पर  मन ही  मन मैं चीख  रहा हूँ |

इस युद्ध में लड़ने  आया  हूँ
तो विजय होकर  ही जाऊँगा ,
हार मिली  तो कर  स्वीकार  मैं
फिर से वापस  लौट   के  आऊँगा  |

अभी तो मैंने शुरुआत  की है
उन कवियों  से मैं पिछला हूँ,
मनमें थोड़ी यादें  लेकर
मैं कवि बनने निकला हूँ |

हारा नहीं हूँ अभी मैं
ना घर जाने  की देरी  है,
मनमें कल्पना  भरी पढ़ी है
मस्तिष्क में कविता  ठहरी  है |

मैं दूसरो से क्या  बात करू 
मैं खुद में खोया  रहता हूँ ,
इस दिल को मैं कर अनदेखा
दुनिया के ताने  सेहता हूँ |

बनके मुसाफिर भटक रहा हूँ
घरकी चौखट  से फिसला हूँ,
दिल में प्यारे ख्वाब सजा कर
मैं कवि बनने निकला हूँ |

भावनाओ से भरा  हुआ  हैं
मेरे मन का कोना  कोना,
लोगो को क्या फर्क पड़ेगा 
इस दुनिया में मेरा  होना  |

मैं बैठ अकेले एक कोने में￰
कोई  गीत  पुराना गाऊँगा,
तन-मन मेरा नाच  उठेगा 
जब में कवि बन जाऊँगा |

अकेलेपन से घिरा  हुआ हूँ
मैं बिन फूलो  का गमला  हूँ,
इन हाथो को कुछ काम  सिखाने 
मैं कवि बनने निकला हूँ |

                                        - यश कुमार

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