सोचा न था कि नए-नए आते ही तुम मेरे इतने अच्छे दोस्त बन जाओगे l
पता न था कि कुछ ही दिनों में तुम इतने छा जाओगे l
पूरे स्कूल के वक़्त तुम हमेशा मेरे साथ रहते थे l
भले ही मॉनिटर बन गए थे पर मुझे कभी भी कुछ नही कहते थे l
भले ही मॉनिटर बन गए थे पर मुझे कभी भी कुछ नही कहते थे l
जल्दी ही तुम सभी के आंखों का तारा बन गए l
जिन्होंने ने भी तुम्हारा तमाशा बनाया वे खुद सबके नज़रो में तमाशा बन गए l
जिन्होंने ने भी तुम्हारा तमाशा बनाया वे खुद सबके नज़रो में तमाशा बन गए l
लंच के समय हमेशा हम साथ मे खाना खाते थे l
चलती हुई कक्षा में भी तुम मुझको बहुत सताते थे l
चलती हुई कक्षा में भी तुम मुझको बहुत सताते थे l
हमारे घर एक दूसरे से मीलो दूर थे |
यही तो वजह थी जो हम मजबूर थे l
यही तो वजह थी जो हम मजबूर थे l
काश हम एक दूसरे के पड़ोसी होते l
खुशहाली का जीवन होता और हमारी दोस्ती में कोई दरार नही होती l
खुशहाली का जीवन होता और हमारी दोस्ती में कोई दरार नही होती l
मेरी और तुम्हारी दोस्ती के बीच मे कोई दीवार नही होती l
जब भी तुम नही आते थे तो पूरा दिन मेरा स्कूल में बेकार
जाता था l
जब पूछता था तुमसे वजह मैं तो एक नया बहाना सुनने में आता था l
अक्सर छुट्टी के समय मुझे तुम्हारे कहने पर और देर तक रुकना पड़ता था l
तुम्हारी छोटी छोटी शरारतों से हमारा दोस्ताना और बढ़ता था l
तुम्हारे बिना लंच करने में तो टिफ़िन खोलने का मन ही नही करता था l
तुम्हारे बिना खाना खाने में तो स्वादिष्ट पकवान भी कड़वे करेले सा लगता था l
कोई विश्वशनीय न था बस तुम्हारा ही साथ था |
मेरी कामयाबी के पीछे तुम्हारा बहुत बड़ा हाथ था |
मैं कवि था और तुम चित्रकार थे |
छोटी सी उम्र से ही हम बडे कलाकार थे |
छोटी सी उम्र से ही हम बडे कलाकार थे |
तुम्हारे कारनामो का सच में कोई जवाब नही था |
तुम्हारी अच्छाइयों का वाकई कोई हिसाब नही था |
तुम्हारी अच्छाइयों का वाकई कोई हिसाब नही था |
मेरी पहली बेकार सी कविता पर भी तुमने उसे गज़ब बताकर मेरा हौसला बढ़ाया था |
तुम्ही में मुझको कवि बनाकर मेरे अंदर के भय के दिए को बुझाया था |
तुम्ही में मुझको कवि बनाकर मेरे अंदर के भय के दिए को बुझाया था |
मेरी कविताओ को दुनिया के प्रकाश में तुम्ही ने लाया था |
कविता भले ही मैंने लिखी थी पर मेरी कला को तुम्ही ने जगाया था |
कविता भले ही मैंने लिखी थी पर मेरी कला को तुम्ही ने जगाया था |
दुनिया में तुम सा कोई है ही नही तुम्हारा नाम ही नही तुम खुद भी अनूठे थे |
मेरी पहली कविता गज़ब की थी बस तुम इसी बात के झूठे थे |
मेरी पहली कविता गज़ब की थी बस तुम इसी बात के झूठे थे |
तुम्हारे उस झूठ से ही तो में आज इस क़ाबिल हूँ जो, यह कविता रच पाया हूँ ,
बस तुम्हारा ही तो साथ था जो मैं उन सब से आगे बढ़ पाया हूँ |
बस तुम्हारा ही तो साथ था जो मैं उन सब से आगे बढ़ पाया हूँ |
- यश कुमार

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