Wednesday, 5 June 2019

माँ


हाँ ! तू ही तो वह चित्रकार है
मै तेरा रचा कोई मोहक चित्र हूँ माँ |
सब कहते मुझे एक साधारण बच्चा
बस तेरी ही नज़रो मे मै विचित्र हूँ माँ |

अँधेरे से डरकर तेरे पीछे छुपना
मै भूल गया हूँ अब वैसा करना,
क्यूंकि मै अब बढ़ा हो गया हूँ माँ |
मेरा भविष्य है तुझे ही रचना 
सिखलाया था तुम्ही ने मुझको चलना,
पर अब अपने पैरो पर खड़ा गया हूँ माँ |

क्यों रोती थी तू मुझे रोता देखकर
तुझे रोता देख तो मै नाटक समझता था |
क्यों करता तुझसे इतनी सख़्ती से बात मै
दूसरों को उदास देख तो मै तुरंत पिघलता था |

मुझे माफ़ कर देना माँ
जो याद ना था मुझे कि,
मातृदिवस आज ही मनाया जाता है |
साल मे एक दिन के लिए
सिर्फ माँ को ही सबसे अनमोल मानकर,
सारी दुनिया को भुलाया जाता है |

सब अपनी माँ पे आज
प्यार लुटाये जा रहे है,
बेटे खुद अपने हाथो से
अपनी माँ को खाना खिला रहे है |

तेरा मै लाडला तो नहीं हूँ
पर हूँ तो मै तेरी ही संतान माँ,
अपने हाथो से  खिलाया नहीं
मैंने तुझे कभी पकवान माँ |

क्या जलन होती है तुझको
दूसरी माँओ की संतान को देखकर,
सिखला दे मुझे भी कैसे हँस पाती है तू
माँ मेरे लिए  तू इतने कष्ट झेलकर |

माँ की एहमियत को समझ ना पाया मै
उलझा रहा दुनिया की झूठी बातो मे,
डर लगता था तो तेरे आँचल मे छुपकर
चैन से सो जाता था मै अँधेरी रातो मे |

अब तो बढ़ा हो गया हूँ ना मै
दोस्तों के संग ही  घूमता रहता हूँ,
कभी रोता था तुझसे दूर होने पर
अब पैसे ही हर जगह ढूंढ़ता रहता हूँ |

तू खड़ी होकर घर की चौखट पर
जमकर वही करती थी इंतजार मेरे आने का,
जिस दिन मै एक निवाला भी ना खाता था
तू भूल जाती थी अपना वक़्त भी खाने का |

क्यों इतनी फ़िक्र करती है तू मेरी
मैंने दिया ही क्या है तुझे माँ,
सारा जीवन अपना व्यर्थ कर दिया
सिर्फ मेरी खुशी के लिए क्यों तूने माँ |

मै सर्वश्रेष्ठ ज्ञानी इतना पढ़ा-लिखा
माँ को बस एक आम नारी समझता था |
क्या मै एक अकेला हूँ दुनिया मे जो
धन पाकर माँ- बाप को अपने से दूर करता था |

ना कोई गुरु ना कोई गोबिंद
माँ से महान है कोई नहीं जग मे,
माँओ से तो यह दुनिया है
सारी दुनिया रंगी हुई है माँ के ही रंग मे |

                                      - यश कुमार

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